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साज है टूटा हुआ ,आवाज है रूठा हुआ !आँख है गम से डूबा हुआ ,दोस्त है मुझसे रूठा हुआ !!-लक्ष्मी नारायण लहरे "साहिल "

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एक पत्र - सखी, आज मत खेल होली ...

Posted On: 27 Mar, 2013 में

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एक पत्र –
सखी, आज मत खेल होली …
————————————–
सखी ,आज मत खेल होली
अबीर -गुलाल से मोहे डर लागे हैं
उमंगित रूप देख तेरा मन भरमाये हैं
आज सुंदर लग रही है रंगों से जो तू सजी है
होली ,के रंग में जो रंग गई है गांवली
पड़ोसन भी तुमसे आज जलने लगे है
सखी ,आज मत खेल होली
मेरे गाँव की होली तुम बीन अधूरा है
कैसे सन्देश भेजूं मै
मेरा मन सूना है
हाँ तुम सज -धज कर तैयार रहना
न आ पाऊं तो
मेरे तस्वीर पर गुलाल मलना
बसंत की हवा ,पतझड़ की आहट कुछ कहती है
आ जाओ सजन मन की आहट कुछ कहती है
० लक्ष्मी नारायण लहरे “साहिल “

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